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बुद्धिमान व्यक्ति स्वयं को प्रयत्नपूर्वक विभिन्न प्रकार के नियमों में खुद को बांधता है। इसके पीछे उद्देश्य है; अपने जीवन को संयमित करते हुए जीवन के लक्ष्य तथा वास्तविक सुख के साधन को प्राप्त करना। वास्तविक सुख का साधन तो धर्म-कर्म और आध्यात्म से ही प्राप्त होगा। सुख से सुख की प्राप्ति नही होती। धर्म नियमों में बांधकर हमारा स्वतः उपकार करता है।
धर्मनिष्ठ व्यक्ति का स्वतः उपकार कैसे होता जाता है?
इसे समझाता हूँ। जीवन को सुव्यवस्थित करना ही साधना है। जहाँ कहीं अव्यवस्था पाएं तय मानिए वहां साधना नहीं है। बस कामचलाऊ व्यवस्था में लोग दिन काट रहे हैं। साधना से मन सधता है और सधा मन सधे कार्य करता है।
जिस व्यक्ति में टालमटोल का रोग लग गया जीवन में उसके सब काम अधूरे पड़े रह जाते हैं। यद्यपि ऐसे लोग हर समय व्यस्त रहते दिखाई पड़ते हैं, फिर भी अपना काम पूरा नहीं कर पाते। कामों का बोझ उनके सिर पर लदा रहता है और वे उससे डरते हुए कामों को धकेलने की कोशिश करते रहते हैं। ऐसे लोगों के कल्याण का एक ही रास्ता है उन्हें नियमों में बांधकर संतुलित करो। व्यवस्थित करने के लिए बंधन दो उसे किसी प्रकार।
धर्मनिष्ठ व्यक्ति तो स्वतः संतुलित नियमों में बंधा होता है। उसे इसके लिए अतिरिक्त प्रयत्न की ज़रूरत ही नहीं। उसका स्वतः उपकार होता रहेगा। यदि बात उचित लगी तो पोस्ट को शेयर ज़रूर कर दें।

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