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दिल्ली में अरविंद केजरीवाल सरकार अब हिंदू तरीके से शवों के अंतिम संस्कार पर पाबंदी चाहती है




दिल्ली में अरविंद केजरीवाल सरकार अब हिंदू तरीके से शवों के अंतिम संस्कार पर पाबंदी चाहती है। दिल्ली के पर्यावरण मंत्री इमरान हुसैन ने कहा है कि शवों को जलाने से प्रदूषण फैलता है। इसलिए ये तरीका बंद होना चाहिए। इसके बजाय सीएनजी या बिजली का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इमरान हुसैन ने इस बारे में केंद्र सरकार को एक पत्र भी लिख डाला है। इसमें उन्होंने दिल्ली में शवों के दाह संस्कार को प्रदूषण के लिए बड़ा कारण बताया है। जबकि वैज्ञानिक तौर पर यह साबित हो चुका है कि शवों को जलाने के मुकाबले उन्हें कब्रिस्तान में गाड़ने से ज्यादा प्रदूषण फैलता है। दिल्ली सरकार को प्रदूषण कम करने के लिए सबसे पहले हिंदुओं के तरीके पर ही नजर क्यों गई?
शवदाह में लकड़ी इस्तेमाल पर बैन!
दिल्ली सरकार ने इस बारे में अपनी तरफ से कोशिश शुरू भी कर दी है। इमरान हुसैन ने केंद्रीय पर्यावरण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अनिल दवे को चिट्ठी लिखकर कहा है कि हिंदू तरीके से दाह संस्कार करने पर हवा में कार्बन डाइ ऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड और नाइट्रोजन मोनो ऑक्साइड जैसी जहरीली गैसें फैलती हैं। साथ ही हवा में तैरने वाले कणों पीएम 2.5 और पीएम 10 का लेवल बढ़ जाता है। ऐसे में लकड़ी पर शवदाह पर पाबंदी होनी चाहिए। इसके बजाय सीएनजी या बिजली का इस्तेमाल शवों को जलाने के लिए करना ठीक होगा।
‘दिल्ली ही नहीं देशभर में पाबंदी लगे’
इमरान हुसैन ने अपनी चिट्ठी में लिखा है कि लकड़ी पर अंतिम संस्कार सिर्फ दिल्ली में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में प्रतिबंधित किया जाना चाहिए। उन्होंने इस बारे में एक तकनीकी कमेटी बनाकर नीति तय करने की मांग की है। साथ ही कहा है कि शवदाह के दूसरे तरीके ढूंढने के लिए केंद्रीय प्रदूषण बोर्ड और दूसरी संस्थाओं को जिम्मेदारी सौंपी जाए। अगर ऐसा किया गया तो दिल्ली ही नहीं बल्कि देश भर में वायु प्रदूषण के स्तर में काफी सुधार आएगा।
क्या हिंदू शवदाह से ही प्रदूषण होता है?
यह बात सही है कि दाह संस्कार के लिए काफी लकड़ी इस्तेमाल होती है, जिसके लिए पेड़ कटते हैं। शव को जलाने से उठने वाला धुआं भी प्रदूषण का कारण बनता है। लेकिन यह बात भी सही है कि शवों के अंतिम संस्कार के दुनिया भर में प्रचलित तरीकों में शव को जलाने का तरीका ही सबसे वैज्ञानिक और कम प्रदूषण वाला है। मुसलमानों और ईसाइयों में शव को दफनाया जाता है, जो वास्तव में ज्यादा खर्चीला और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाला होता है। तो सवाल ये है कि केजरीवाल सरकार को प्रदूषण के लिए सबसे पहले हिंदू तरीके की ही याद क्यों आई?
ज्यादा प्रदूषण फैलाता है शव दफनाना
दुनिया भर में अंतिम संस्कार के तीन तरीके हैं- 1. शवदाह 2. शव को दफनाना और 3. शवों को खुला छोड़ देना या पानी में बहा देना। जब किसी शव को जमीन में गाड़ते हैं तो उसके सड़ने की प्रक्रिया शुरू हो जाती है। इस दौरान उसका pH बैलेंस बहुत अधिक होता है, जिससे शरीर के अच्छे तत्व बाहर नहीं निकल पाते। शरीर के तत्वों के विघटित होने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है जिससे बहुत अधिक बदबू पैदा होती है। आप किसी भी कब्रिस्तान के आसपास जाएं, वहां हवा में आपको अजीबोगरीब बदबू हर वक्त महसूस होगी।
जुआन कैरोल क्रूज़ ने 1977 में आई अपनी किताब The Incorruptibles: A Study of the Incorruption of the Bodies of Various Catholic Saints and Beati में लिखा है कि गहराई में दफनाने के बावजूद भी शवों के सड़ने की भयंकर बदबू शहरी कब्रिस्तानों के आसपास फैली रहती है। ये वो गैसें होती हैं जो आसपास रहने वालों के स्नायु तंत्र (nerves system) पर बुरा असर डालती हैं। कब्रिस्तानों की जमीन में सोडियम की मात्रा 200 से 2000 गुना अधिक होती है, जिससे पेड़-पौधों पर बहुत बुरा असर पड़ता है। यही कारण है कि कब्रिस्तान में कुछ खास तरह के पेड़-पौधे ही पनप पाते हैं। मृत शरीर सड़ने पर जमीन में कई तरह के बैक्टीरिया और जानलेवा टॉक्सिन बन जाते हैं। जो ग्राउंड वॉटर में मिलकर भयानक बीमारियां पैदा करते हैं। कैंसर के कई मरीजों के शरीर में बोटूलिनम (Botulinum) नाम का टॉक्सिन पाया गया है जो कब्रिस्तान के आसपास की जमीन से निकले पानी के जरिए शरीर में पहुंचता है। इसके अलावा आर्सेनिक, फार्मेल्डिहाइड, मर्करी, कॉपर, लेड और जिंक जैसे तत्व भी शरीर से बाहर आते हैं जो ग्राउंड वाटर में जहर की तरह घुल जाते हैं।

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