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राष्ट्रीयता की भावना

राष्ट्रीयता की भावना न ही बाज़ार में बिकती है और न ही भाड़े पर मिलती है, उसे लोगों के अंदर पैदा करना पड़ता है, इसलिए, ऐसी कोई भी विकास की प्रक्रिया को राष्ट्र के लिए आदर्श नीति नहीं कहा जा सकता जो अर्थ व्यवस्था के लाभ हानि तक सीमित हो और राष्ट्रीयता की भावना के महत्व की उपेक्षा करे।

राष्ट्रीयता की भावना नागरिकों को राष्ट्र के प्रति समर्पण और समाज के उत्थान के प्रति निरंतर प्रयासरत रहने के लिए प्रेरित करती है; अतः राष्ट्रीयता की भावना के लिए राष्ट्र के नागरिकों की स्थिति महत्वपूर्ण है।

जब तक समाज में व्यक्ति आर्थिक, सामाजिक अथवा शैक्षणिक दृष्टि से असहाय अथवा असुरक्षित महसूस करेगा, उसमे न केवल आत्मविश्वास का आभाव होगा बल्कि उसके लिए प्राथमिकता की सूची में व्यक्तिगत सम्पन्नता भी राष्ट्रीयता की भावना से अधिक महत्वपूर्ण होगा।

समाज में व्यक्ति को व्यवस्था के माध्यम से भविष्य के प्रति सुरक्षित एवं आस्वश्त करना होगा तभी उनके लिए राष्ट्र का महत्व व्यक्ति और परिवार से ऊपर होगा। इसके लिए न केवल शिक्षा की नीति एवं पद्धति में परिवर्तन की आवश्यकता होगी बल्कि पाठ्यक्रम एवं शिक्षण-अध्यन की प्रक्रिया में सुधर भी करना पड़ेगा। अर्थव्यवस्था का आधार बाज़ार के मांग और पूर्ती के बजाये समय की आवश्यकता और संसाधनों के उपयोग को बनाना होगा और सामाजिक चेतना के स्तर को  महत्व के लिए तुलनात्मक दृष्टिकोण पर आश्रित रहने के बजाये व्यक्तिगत विशिष्टता को महत्व का आधार बनाना होगा।

यह सरल न होगा पर शिखर की चढाई सरल होती भी नहीं।

अगर हम भारत को वैभव के शीर्ष पर देखना चाहते हैं, तो सिर्फ चाहने से कुछ न होगा, हमें इसके लिए पूरी निष्ठां से प्रयास भी करने होंगे। सामाजिक जीवन में अपने आचार, विचार और आचरण से आदर्श का उदाहरण प्रस्तुत करना पड़ेगा। अपेक्ष्याएँ दूसरों से नहीं स्वयं से करनी होगी और अपने प्रयास द्वारा स्वयं से स्वयं की अपेक्षाओं का विस्तार करते रहना होगा तभी हम वर्त्तमान के लिए आदर्श और भविष्य के लिए प्रेरणा स्त्रोत बन सकेंगे।

अगर अभूतपूर्व परिणाम चाहिए तो प्रयास भी अभूतपूर्व ही करने पड़ेंगे और जैसा आज तक चल रहा है और चलता आया है उससे अलग कुछ नया करना होगा ; केवल इतना ही नहीं, ऐसे अभूतपूर्व प्रयासों की आदत भी हमें डालनी पड़ेगी क्योंकि यही भविष्य की शैली होगी।

अगर हम ऐसा कर सके तो निश्चित रूप से एक ऐसी पीढ़ी का निर्माण कर पाएंगे जिनके लिए आदर्श आचरण ही व्यवहारिकता का उदाहरण होगा और वही सही अर्थों में भारत का परम वैभव भी।
Via Prachur

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